पुत्र प्राप्ति के लिये ज्योतिष उपाय
घर में बच्चों से ही रौनक होती है जिस घर में बच्चे नहीं होते वह घर खाली सा लगता। ऐसा भी देखा गया है बहुत से दंपत्तियों या सिर्फ पुत्रों की ही प्राप्ति होती है या फिर पुत्रियों की। ऐसे दंपत्तियों की यही इच्छा होती है कि उनके यहाॅ एक वेटा या वेटी और हो जाये तो उनका परिवार पूर्ण हो जायें।
हमारे यहाॅ ऐसे कई उपाय बताये गये है जिनको अपनाकर हम मनचाही संतान प्राप्त कर सकते है मतलब यदि किसी के पुत्री नहीं है तो वह पुत्री पा सकता है और किसी के पुत्र नहीं है तो वह पुत्र की प्राप्ति कर सकता है।
हमारे ज्योतिष विज्ञान में ऐसे कई व्रत और पूजा बताये गये हैै जिनको करने से मन चाही संतान प्राप्त की जा सकती है। इस लेख में हम कुछ ऐसे व्रतो के वारे बताने जा रहे है जिनको करने से आपको पुत्र लाभ अवश्य मिलेगा।
पुत्र प्राप्ति के लिए ज्योतिष उपाय :
मंगलवार व्रत :
जिन दंपत्तियों के पुत्र नहीं है मंगलवार का व्रत रखना ऐसे दंपत्तियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। हालाॅकि जो दंपत्तिय संतान सुख से बंछित या जिनके पुत्री नहीं है उनके लिए भी यह व्रत महत्व रखता है क्योकि इस व्रत को करने से वह मनचाही संतान प्राप्त कर सकते है।
कैसे करे यह व्रत – इस व्रत को करने के लिए दंपत्ति को शुक्लपक्ष के समय का चुनाव करना होता है। इस पक्ष के पहले मंगलवार से आप व्रत रखना शुरू कर दीजिए और अलगे आठ मंगलवार दंपत्ति को व्रत रखना चाहिए। इस व्रत में लाल वस्त्र पहनकर हनुमान जी की पूजा की जाती है और दिन में एक वार ही गुड़ तथा गेहॅू के वने भोजन को करना चाहिए।

Krishna as Damodara
अहोई अष्ठम व्रत :
यह व्रत भी दंपत्तियों को संतान सुख प्रदान करने वाला माना जाता है। इस व्रत को महिलाएं कार्तिक माह में करती है इस माह में महिलाओ को कृष्णपक्ष की अष्ठमी के दिन निर्जल व्रत रखना होता है। शाम के समय इस व्रत को पूर्ण करने के लिए एक आठ काॅनों वाली आक्रती दीवार पर बनानी होती है उसके साथ ही स्याऊ माॅ और उनकी संताने भी बनाते है और उसके पश्चात एक महिला जिसके या तो पुत्र हो अथवा उसने अपने पुत्र का विवाह किया हो, अहोही माता का उजमन करती है।
इसके पश्चात व्रत रखने वाली महिला को एक थाली लेकर उसमें चार–चार पूड़ियाॅ 7 जगह रखनी चाहिए। पूड़ियों पर थोड़ा थोड़ा हलवा भी रखा जाता है। व्रत करने वाली स्त्री को साड़ी और ब्लाऊज को भी उस थाली में रखकर, उस थाली में थोड़े रूपये अपनी सामार्थ के अनुशार रखकर, श्रृद्धाभाव से उस थाली कोे अपने साॅस को देकर उनके पैर छूकर आशीष लेते है। शाम के समय चन्द्र देव को आध्र्य दिया जाता है और उसके पश्चात ही कच्चा भोजन खाया जाता है और उनकी कथा भी पढ़ी जाती है।
शीतला षष्ठी व्रत :
निसंतान दंपत्तियों के लिए यह व्रत भी बहुत अहम माना जाता है। इस व्रत को श्रृद्धापूर्वक करने से पुत्र प्रात्ति की मनोकामना पूर्ण होती है। यह व्रत माघ शुक्ल की षष्ठी को रखा जाता है। यह व्रत बासियौरा के नाम से भी रखा जाता है। प्रातः काल उठकर स्थान करने की पश्चात माॅ शीतला देवी का श्रृद्धापूर्वक पूजन किया जाता है। इस व्रत में वासी भोजन का भोग लगता है और भासी भोजन ही किया जाता है।