षोडश मातृका | Shodash Matruka

Akhilanda Koti Brahmanda Nayaki Maa Shakti

Akhilanda Koti Brahmanda Nayaki Maa Shakti

षोडश मातृका

गौरी पद्मा शची मेधा, सावित्री विजया जया ।
देवसेना स्वधा स्वाहा, मातरो लोकमातरः॥

धृतिः पुष्टिस्तथा तुष्टिः, आत्मनः कुलदेवता ।
गणेशेनाधिका ह्येता, वृद्धौ पूज्याश्च षोडश॥

गौरी :- स्वामी भगवान शिव :- हिमालय की पुत्री तथा शिव की अर्द्धागिनी के रूप में अंकित हैं।
वे देवी, दुर्गा, गौरी, पार्वती, उमा आदि 108 नामों से विख्यात हैं।
उनसे अत्यधिक आत्मीयता होने के कारण ही शिव अर्धनारीश्वर कहलाये।
उमा, अंबा, अंबालिका आदि विभिन्न नाम किसी न किसी मिथक से जुड़े हुए हैं।

शिव ने क्रोध का शमन करने की शक्ति भी पार्वती में ही है।
आधुनिक काल में प्रचलित अनेक देवियों की मूलाधार पराशक्ति तथा परंपरा का आरंभ पूर्वोक्त तीन शक्तिस्वरूपा देवियां हैं।

पद्मा :-स्वामी भगवान विष्णु :-लक्ष्मी का आदि रूप पृथ्वी है कमल के फूल पर बैठी हुई देवी | यह एक द्रविड़ कल्पना थी | आर्यों ने उस को आसन से उतार कर उसका स्थान ब्रह्मा को दे दिया |पर अनेक सदियों तक आम जनता में पृथ्वी की पूजा बनी रही तो लक्ष्मी को ब्रह्मा के साथ बिठा कर वही आसान उसको फ़िर से दे दिया …बाद में विष्णु के साथ उसको बिठा दिया .विष्णु के वामन अवतार के समय लक्ष्मी पद्मा कहलाई ,परशुराम बनने के समय वह धरणी बनी .राम के अवतार के समय सीता का रूप लिया और कृष्ण के समय राधा का ..बस यही समरूपता का आचरण है …

शची:- इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी का एक नाम है। इसके पिता असुर पुलोमा के थे। मेरुगिरि के शिखर अमरावती नामवाली एक रमणीय पुरी है। उसे पूर्वकाल में विश्वकर्मा ने बनाया था। उस पुरी में देवताओं द्वारा सेवित इन्द्र अपनी साध्वी पत्‍नी शची के साथ निवास करते थे।

मेधा :- स्वामी बुध्दिदेव 
यजुर्वेद के ३२वें अध्याय में मेधा-प्राप्ति के कुछ मन्त्र पठित हैं, जो मेधा-परक होने से ‘मेधा-सूक्त’ कहलाते हैं । ‘मेधा’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है – धारणा शक्ति प्रज्ञा बुद्धि आदि । मेधा-शक्ति-सम्पन्न व्यक्ति ही ‘मेधावी’ कहलाता है । ‘मेधा’ बुद्धि की एक शक्ति-विशेष है । जो गृहित-ज्ञान को धारण करती है और यथा-समय उसे व्यक्त भी कर देती है । इसी मेधा की प्राप्ति के लिये इन मन्त्रों में अग्नि, वरुण-देव, प्रजापति, इन्द्र, वायु, धाता आदि की प्रार्थना की गयी है ।

सावित्री -स्वामी ब्रह्मा :-

ब्रह्मा निर्विकार परमात्मा की शक्ति है, जो सृष्टि का निर्माण करती है। इस निर्माण कार्य को चालू करने के लिए उसकी दो भुजाएँ हैं, जिन्हें संकल्प और परमाणु शक्ति कहते हैं। संकल्प शक्ति चेतन सत्- संभव होने से ब्रह्मा की पुत्री है। परमाणु शक्ति स्थूल क्रियाशील एवं तम- संभव होने से ब्रह्मा की पत्नी है। इस प्रकार गायत्री और सावित्री ब्रह्मा की पुत्री तथा पत्नी नाम से प्रसिद्ध हुईं।

विजया -स्वामी विजयप्रददेव :-

धर्मसिंधुमें अपराजिता की पूजन की विधि संक्षेप में इस प्रकार है‌- “अपराह्न में गाँव के उत्तर पूर्व जाना चाहिए, एक स्वच्छ स्थल पर गोबर से लीप देना चाहिए, चंदन से आठ कोणों का एक चित्र खींच देना चाहिए, संकल्प करना चहिए – “मम सकुटुम्बस्य क्षेमसिद्ध्‌यर्थमपराजितापूजनं करिष्ये; राजा के लिए – ” मम सकुटुम्बस्य यात्रायां विजयसिद्ध्‌यर्थमपराजितापूजनं करिष्ये”। इसके उपरांत उस चित्र (आकृति) के बीच में अपराजिता का आवाहन करना चाहिए और इसी प्रकार उसके दाहिने एवं बायें जया एवं विजया का आवाहन करना चहिए और ‘साथ ही क्रियाशक्ति को नमस्कार’ एवं ‘उमा को नमस्कार’ कहना चाहिए। इसके उपरांत “अपराजितायै नम:, जयायै नम:, विजयायै नम:, मंत्रों के साथ अपराजिता, जया, विजया की पूजा 16 उपचारों के साथ करनी चाहिए ।जया के स्वामी-
जयप्रददेव है ।

देवसेना – स्वामी कार्तिकेय :-

‘ब्रह्मवैवर्तपुराण’ में छठ को स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत के इतिहास से जोड़ते हुए बताया गया है कि षष्ठी देवी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो गया। तभी से प्रकृति का छठा अंश मानी जाने वाली षष्ठी देवी बालकों के रक्षिका और संतान देने वाली देवी के रूप में पूजी जाने लगी।

छठ के साथ स्कन्द पूजा की भी परम्परा जुड़ी है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा रक्षा की थी। इसी कारण स्कन्द के छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा।

कार्तिक से सम्बन्ध होने के कारण षष्ठी देवी को स्कन्द की पत्नी ‘देवसेना’ नाम से भी पूजा जाने लगा।

स्वधा – स्वामी अग्निदेव :-

मनु-शतरूपा की कन्या आकूति का विवाह पुत्रिका धर्म के अनुसार रूचि प्रजापति से तथा प्रसूति कन्या का विवाह ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति से किया। उससे उन्होंने सुंदर नेत्रों वाली सोलह कन्यायें उत्पन्न कीं। इनमें से तेरह कन्यायें (श्रद्धा, मैत्री, दया, शांति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति) धर्म की पत्नियां बनीं। स्वाहा नाम की कन्या एवं स्वधा नाम की अग्निदेव, को स्वधा नामक कन्या समस्त पितरों के लिए तथा सती नाम की कन्या महादेव की पत्नी बनीं।

स्वाहा – स्वामी अग्निदेव :-

अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।

वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार-बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है।

आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे-आगे चलते हैं। युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था।

पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। ये सब देवताओं के मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है। केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं।

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