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Shiva Aur Shani Ka Yuddh | भगवान शिव और शनि का युद्ध

संतानों के योग्य होने पर सूर्य ने प्रत्येक संतान के लिए प्रत्येक लोक की व्यवस्था की किंतु शनि अपने लोग से संतुष्ट नहीं हुए | उन्होंने समस्त लोगों पर आक्रमण करने की योजना बनाई सूर्य को शनि की इस भावना से अत्यंत कष्ट हुआ |

अब तो शनि के आतंक की पराकाष्ठा ही हो चुकी थी | सूर्य ने भगवान शिव से निवेदन किया कि वही शनि को समझाए | भगवान शिव ने शनि को चेतावनी दी परंतु शनि ने भगवान शिव की चेतावनी की भी उपेक्षा कर दी | इस उपेक्षा से भगवान शिव अत्यधिक क्रोध हुए और उन्होंने शनि को दंडित करने का निश्चय किया | घनघोर युद्ध के पश्चात भगवान शिव के प्रहार से शनि अचेत हो गए | पुत्र की स्थिति को देखकर सूर्य का पुत्र मोह जागृत हो गया | उन्होंने भगवान शिव से शनि को जीवन दान देने की प्रार्थना की | शिव जी ने सूर्य की प्रार्थना स्वीकार कर शनि को छोड़ दिया |

इस घटना से शनि ने भगवान शिव की सामर्थ्य स्वीकार कर ली | शनि ने यह भी इच्छा अभियुक्त की कि वह अपनी समस्त सेवाएं भगवान शिव को समर्पित करना चाहते हैं | शनि के रणकौशल से अभिभूत भगवान शंकर ने शनि को अपना सेवक बना लिया और उसे अपना दंडाधिकारी नियुक्त किया |

यह अधिकार प्राप्त होने के पश्चात शनि एक सच्चे न्यायाधीश की भांति जीवो को दंड देकर भगवान शिव के कार्यों में सहायता करने लगे | अब शनि व्यर्थ ही किसी को परेशान नहीं करते थे |

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