Rishi Panchami Vrat Katha in Hindi | ऋषि पंचमी व्रत कथा | ऋषि पंचमी पूजन की कहानी

ऋषि पंचमी व्रत भाद्रपदा शुक्ल पंचमी के दिन मनाई जाती है| ऋषि पंचमी व्रत विधि में दो कथाये पठन करनी चहिये| वह दो कथाये इस प्रकार के है|

ऋषि पंचमी व्रत विधि, कैसे करें ऋषि पंचमी पूजन

Rishi Panchami Vrat Katha in English

Importance of Rishi Panchami Vrat

ऋषि पंचमी व्रत कथा – १

एक नगर में एक ब्राह्मण रहता था ।एक दिन ब्राह्मण की पत्नी ने ऋषि पंचमी का उद्यापन करने की सोची ।इसकेलिए उसने ऋषियों को भोजन के लिए आमंत्रण दिया ।लेकिन दुसरे दिन वह दूर की (mc) हो गई ।उसने सोचा अब क्या करे ,वह अपनी पड़ोसन के पास गई और पुछा “की मैं क्या करु ,मैंने तो आज ऋषियों को जीमने का न्योता दिया है और आज ही मैं दूर की हो गई “! पड़ोसन ने कहा कि तू सात बार नहा ले और सात बार कपड़े बदल ले और फिर खाना बना ले । उसने ऐसा ही किया ।

ऋषि जब घर आए और ब्राहमण की पत्नी से पूछा” कि हम 12 वर्ष में आँख खोलते हैं भोजन में कोई आपत्ति तो नहीं हैं “! ब्राहमण की पत्नी ने कहा “कि भोजन में कोई आपत्ति नहीं है ” आप आँख खोलिए ।ऋषियों ने जैसे ही आँख खोली तो देखा कि भोजन में लट \कीड़े हैं ,यह देखकर उन्होंने ब्राहमण व् उसकी पत्नी को श्राप दे दिया । उनके श्राप के कारण अगले जन्म में ब्राहमण ने तो बैल का व उसकी पत्नी ने कुतिया के रूप में जन्म लिया ।दोनों अपने बेटे के यहाँ रहने लगे ।

बेटा बहुत धार्मिक था ।एक दिन लडके के माता – पिता के श्राद्ध का दिन आया ,इसलिए उसने ब्राहमणों को भोजन पर बुलाया । यह देख बैल व् कुतिया बाते करने लगे की आज तो अपना बेटा श्राद कर रहा हैं ।खीर पुड़ी खाने को मिलेगी ।ब्राह्मन के बेटे की बहु खीर बनाने के लिए दूध चूल्हे (gas) पर चढ़ा कर अन्दर गई तो दूध में एक छिपकली का बच्चा गिर गया ।कुतिया यह देख रही थी । उसनें सोचा की ब्राहमण यह खीर खायेगें तो मर जायेगें और अपने बहु \बेटे को श्राप लगेगा । ऐसा सोचकर उसनें दूध कि भगोनी में मुहँ लगा दिया ।

बहु ने ये सब देख लिया ।उसे बहुत क्रोध आया ,उसनें चूल्हे की लकड़ी निकाल कर कुतिया को बहुत मारा । उसकी कमर टूट गई ।बहु ने उस दूध को फैका ,और दुबारा से रसोई बनाई व आमंत्रित ब्रह्मण \ब्राह्मणी को जीमाया ।बहु रोज़ कुतिया को रोटी देती थी ,पर उस दिन खाने को कुछ भी नहीं दिया ।रात को कुतिया बैल के पास गई ,और बोली आज तो मूझे बहु ने बहुत मारा  मेरी कमर ही टूट गई और रोटी भी नहीं दी ।बैल बोला आज मैं भी बहुत भूखा हूँ ,आज मुझे भी खाने को कुछ नहीं मिला ।

दोनों बातें कर रहे थे कि तुने पिछले जन्म में दूर की होने पर भी ऋषियों के लिए खाना बनाया था अत: उन्ही के श्राप के कारण हमे ये सब भुगतना पड़ रहा हैं ।वे दोनों जब ये बाते कर रहें थे ,तो उनके बेटे ने उनकी बाते सुन ली ।उसे अपने माता – पिता के बारे में ये सब सुन कर बहुत दु:ख हुआ ।उसने कुतिया को रोटी दी और बैल को चारा दिया ।दुसरे दिन वह ऋषयो के पास गया और अपने माता – पिता की मुक्ति का उपाय पूछा ।ऋषि बोले की भादवे की शुक्ल पक्ष की पंचमी को व्रत करना और अपने माता-पिता को ऋषियों के नहाये पानी से नहलाना ।उसने एसा ही किया और अपने माता-पिता को कुतिया बैल की योनी से मुक्ति करायी ।

ऋषि पंचमी व्रत कथा – २

एक ब्राहमण था । वह ऋषी पंचमी का व्रत करता था ।उसने पूजा करने के लिए प्रसाद बनाया और किसी काम से बाहर गया ।उसके सात बहुएं थी ।सबसे छोटी बहु का मन प्रसाद खाने का हुआ ।उसने सोचा कि थोडा सा प्रसाद खा लेती हूँ ,ससुरजी को क्या पता चलेगा ।उसने थोड़ा सा प्रसाद खा लिया और जेसें ससुरजी प्रसाद रख कर गये थे वैसे ही रख दिया ।

जब ससुरजी ने पूजा की और भोग लगाने के लिए लखेसरो (कौओ ) के पास रखा तो उन्हों ने खाया नहीं ।जब ससुरजी ने पास जाकर देखा तो प्रसाद में कीड़े हो गये थे । छोटी बहु पेट से  थी ।लखेसरो ने उसे श्राप दिया कि एक ऋषि पंचमी को को तेरे बच्चा जन्म लेगा और एक ऋषि पंचमी को मरेगा ।अब ऐसा ही होने लगा ।इससे सभी घर वाले परेशान होने लगे , की ये तो कोई त्यौहार ही नहीं करने देती ।उन सबने उसके पति से कहा कि इसे जंगल में ले जाकर मार दो ।जब सभी घर वाले उसके पीछे ही पड़ गये तो वो अपनी पत्नी (छोटी बहु ) को जंगल में ले गया । लेकिन उसने उसे मारा नही , और घर आ गया ।सब लोग अब ख़ुशी -ख़ुशी रहने लगे । उधर छोटी बहु जंगल में घुमती -घुमती ऋषियों की आश्रम पहुचं गयी ।

जब ऋषियों ने जंगल में अकेली औरत को देखा तो पूछा ” कि तुम यहाँ क्या कर रही हो “तो उसने अपनी आप बीती ऋषियों को सुनाई । तब ऋषियों ने उसे बताया “कि तुम्हें तो श्राप मिला हुआ है ।बहु ने पूछा की इसकी मुक्ति का क्या उपाय है ।तब उन्हों ने बताया की तुम तालाब के पास जाओ जहाँ लखेसर नहाते हें उनके नहाये पानी के छीटें खाने से तुम्हारा दोष दूर होगा ।उसने ऐसा ही किया ,इससे उसका दोष दूर हो गया ।और उसके जो बच्चा हुआ वह जीवित रहा ।उसने वही जंगल में एक कुटिया बना ली और रहने लगी ।उसका बच्चा भी बड़ा होने लगा ।

एक दिन उसके पति के मन में विचार आया कि अपन देखें तो सही की अपनी पत्नी जिन्दा भी है या नहीं ।वह जंगल में गया तो उसने देखा की उसकी पत्नी एक बच्चे को खिला रही है ।वह उसके पास गया और पूछा ” कि तुम कैसी हो और ये बच्चा तुम्हारे पास कहा से आया “।तब उसने सारी बात बताई कि कैसे उसका दोष दूर हुआ ।वह बहुत खुश हुआ और उसे और अपने बच्चे को लेकर घर आया तथा अपने घर वालो को सारी बात बताई ।सारे घर वाले बहुत खुश हुए और  छोटी बहु व उसके बच्चे का खूब स्वागत किया ।सब लोग ख़ुशी – ख़ुशी एक साथ रहने लगे ।

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