कौनसी राशि की जातक कौनसी देवता की आराधना करें | Kaunsi Rashi Ki Jathak Kaunsi Devta Ki Aradhana

जातक को किस देवता की आराधना करनी चाहिए।

मेष राशि (Aries) मंगल ग्रह के अधीन है, यह राशि अग्नि तत्‍वीय, चतुष्‍पदीय चर स्‍वभाव की है। चर स्‍वभाव के कारण गतिशीलता इन जातकों का प्रमुख गुण होता है। बल की अधिकता होने के कारण इस राशि के अधिक प्रभाव वाले जातकों को मंगल के प्रतीक हनुमानजी की आराधना करने का लाभ प्राप्‍त होता है।

वृष राशि (Taurus) शुक्र के अधीन स्थिर और पृथ्‍वीतत्‍वीय राशि है। इस राशि के जातकों की प्रकृति अपेक्षाकृत स्थिर होती है। शुक्र के रूप में देवी की आराधना करने से इनको लाभ होता है। अब वृष राशि पर किन ग्रहों की दृष्टि और प्रभाव है, उसके अनुसार देवी का चुनाव किया जाएगा।

मिथुन राशि (Gemini) द्विस्‍वभाव राशि है। यह वायु तत्‍वीय है। यह बांझ राशि है। इसका अधिपति बुध है। बुध के स्‍वामी गणेशजी को बताया गया है। ऐसे में गणेश आराधना करने से बुध राशि के प्रभाव वाले स्‍थानों का लाभ मिलेगा।

कर्क राशि (Cancer) जलतत्‍वीय, चर स्‍वभाव और ठण्‍डी राशि है। इस राशि के प्रभाव वाले जातकों के लिए चंद्रमा सबसे महत्‍वपूर्ण ग्रह होगा। चंद्रमा का अधिपति भगवान शिव को बताया गया है।

सिंह राशि (Leo) स्थिर स्‍वभाव की अ‍ग्‍नतत्‍वीय राशि है। मेष जहां चर स्‍वभाव की अग्नि है वहीं सिंह में यह अग्नि स्थिर प्रकृति की हो जाती है। ऐसे में स्‍वभाव में तेजी होने के बावजूद दिखने में स्थिरता दिखाई देती है। कह सकते हैं बैठा हुआ शेर। सिंह राशि का अधिपति सूर्य है। ऐसे में सूर्य आराधना लाभ देगी। कन्‍या (Virgo) राशि दूसरी द्विस्‍वभाव राशि है। यह पृथ्‍वीतत्‍वीय है। अब एक ओर पृथ्‍वी की स्थिरता है तो दूसरी ओर द्विस्‍वभाव का दोलन। वायुतत्वीय मिथुन राशि के द्विस्‍वभाव की तुलना में कन्‍या का द्विस्‍वभाव कुछ स्थिर प्रकृति का होगा। इस राशि का अधिपति भी बुध को ही बनाया गया है। बुध के अधिपति गणेशजी इस राशि से प्रभावित जातकों को लाभान्वित करेंगे।

तुला राशि (LIBRA) : यह शुक्र (VENUS) के अधीन वायुतत्‍वीय और चर राशि है। शुक्र की इस दूसरी राशि में शनि उच्‍च का होता है और सूर्य नीच का। जिस प्रकार का जातक की कुण्‍डली में शनि होगा, वैसी ही जातक की स्थिति होगी। लाल किताब तो यहां तक कहती है कि अगर शनि नष्‍ट हो रहा हो तो वहां शुक्र आकर बलिदान कर देगा। तुला राशि वाले जातक शनिदेव की अथवा देवी की आरधना कर सकते हैं। अगर कुण्‍डली में शनि अथवा शुक्र पर मंगल का प्रभाव हो तो कई बार हनुमान (Hanumaan) आराधना भी उपयोगी सिद्ध हो सकती है…

वृश्चिक राशि (Scorpio) : यह मंगल (MARS) के अधीन दूसरी राशि है। यह जलतत्‍वीय और स्थिर है। इस लग्‍न वाले लोगों को भाग्‍य भाव के अधिपति के रूप में चंद्र और कर्मभाव के अधिपति के रूप में सूर्य मिलते हैं। हालांकि इन लोगों का मूल स्‍वभाव स्थिर होकर काम करने का होता है, फिर भी लग्‍नेश की स्थिति पर ही निर्णय किया जा सकता है कि ये लोग मूवमेंट के साथ काम करने वाले हैं या एक जगह स्थिर होकर। चंद्र के अधिपति देव शिव भाग्‍य को बढ़ाने वाले सिद्ध होंगे। वहीं कर्म के क्षेत्र में तेज सफलताएं अर्जित करने के लिए सूर्य (Surya) उपासना सहायक सिद्ध होगा!

धनु राशि (Sagittarius) : यह गुरु (JUPITER) के अधिकार क्षेत्र में आने वाली राशि है। यह अग्नितत्‍वीय एवं द्विस्‍वभाव है। किसी भी द्विस्‍वभाव लग्‍न की तरह धनु लग्‍न में भी कोई एक ग्रह कारक ग्रह नहीं बन पाता है। ऐसे में लग्‍न त्रिकोण होने पर लग्‍न और चतुर्थ का स्‍वामी गुरु खुद ही कारक बन जाता है। इसके साथ ही एक और सुखद संयोग यह है कि करीब दो तिहाई कुण्‍डलियों में सूर्य और बुध साथ रहते हैं। धनु लग्‍न की कुण्‍डली में सूर्य नवम भाव का तो बुध दशम भाव का अधिपति है। इन दोनों ग्रहों का मेल जातक को सहज रूप से राजयोग के रूप में मिल जाता है। इस राजयोग को सक्रिय करने के लिए भगवान लक्ष्‍मीनारायण (Lakshminarayan) की आराधना लाभ दे सकती है।

मकर राशि (Capricorn) : यह शनि (Saturn) के अधीन पहली राशि है। भले ही मकर लग्‍न के लोगों का लग्‍नाधिपति शनि हो, लेकिन इनकी कुण्‍डली में कारक ग्रह शुक्र ही बनता है। मकर राशि पृथ्‍वीतत्‍वीय और चर राशि है। कारक ग्रह शुक्र होने के कारण देवी आराधना इन जातकों को तेजी से फल देती है वहीं शनि अराधना इन लोगों को कार्य करने की अधिक शक्ति प्रदान करती है। मकर लग्‍न में अथवा मकर लग्‍न के सप्‍तम भाव में मंगल आकर बैठ जाए तो जातक को हनुमान आरधना भी फल देने वाली सिद्ध होती है।

कुंभ राशि (Aquarius) : यह वायुतत्‍वीय और स्थिर राशि है। अपनी उपस्थिति में लंबे दिखाई देने वाले इन जातकों को भी कारक ग्रह के रूप में शुक्र ही मिलता है। यहां वायुतत्‍व और स्थिरता के साथ देवी मुझे सरस्‍वती और कालिका (Lord Kalika) दिखाई देती है। हालांकि काली में संहारक शक्ति भी है। ऐसे में मंगल की भूमिका को भी देखना होगा कि अगर मंगल और लग्‍न का मंगल से संबंध हो तो ही जातक काली की आराधना करे। अन्‍यथा नुकसान भी हो सकता है।

मीन राशि (Pisces) : यह गुरु के अधीन दूसरी राशि है। यह जल तत्‍वीय और द्विस्‍वभाव है। जैसे दो रंग का पानी। मेरा अनुभव है कि किसी अन्‍य ग्रह की तुलना में इस लग्‍न में चंद्रमा ही सबसे शक्तिशाली ग्रह बनकर उभरता है। ऐसे में चंद्रमा को मजबूत बनाए जाने की जरूरत होती है। शिव (Shiv) आराधना से बेहतर और कोई साधन नहीं है जिससे चंद्र को मजबूत किया जा सके। ऐसे में शिव मीन राशि के सबसे शक्तिशाली देव हैं। अन्‍य देवों की बात की जाए तो पीतांबर धारी कृष्‍ण (Lord Krishna) इस लग्‍न वाले जातकों के लिए सबसे अनुकूल देवता सिद्ध होते हैं।

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