जितिया व्रत कथा | जीमूतवाहन व्रत कथा | Jitiya Vrat Katha in Hindi

जितिया व्रत कथा जीमूतवाहन की सम्बंदित है| जितिया व्रत आश्विन मॉस की कृष्णा पक्ष अष्टमी तिथि के दिन कियाजाता है|

जितिया व्रत कथा

एक बार जीमूतवाहन गंधमादन पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे उसी समय उनके कानों में एक वृद्ध स्त्री के रोने की आवाज आई। जीमूतवान ने महिला के पास जाकर रोने का कारण पूछा तो उसने कहा कि मैं शंखचूड़ नाग की माता हूं। आज भगवान विष्णु का वाहन गरूड़ शंखचूड़ को उठा कर ले जाएगा औ खा जाएगा। इसलिए दु:खी होकर रो रही हूं।

जिमूतवाहन ने कहा कि मैं आज आपके पुत्र के बदले गरूड़ का आहार बनूंगा और आपके पुत्र की रक्षा करूंगा। गरूड़ जब शंखचूड़ को लेने आया तो जिमूतवाहन शंखचूड़ बनकर बैठ गया। गरूड़ जीमूतवाहन को लेकर उड़ चला। लेकिन कुछ दूर जाने के बाद उसे एहसास हुआ कि वह शंखचूड़ की जगह एक मानव को उठा लाया है।

गरूड़ ने पूछा कि हे मानव तुम कौन हो और मेरा भोजन बनने क्यों चले आए। इस पर जिमूतवाहन ने कहा कि वह राजा जिमूतवाहन है। शंखचूड़ की माता को पु़त्र वियोग से बचाने के लिए मैं आपका आहार बनने चला आया। गरूड़ राजा के दया औरर परोपकार की भावना से प्रसन्न हो गए। जिमूतवान को वरदान दिया कि तुम सौ वर्ष तक पृथ्वी का राज भोगकर बैकुंठ जाओगे।

जिमूतवाहन के कारण शंखचूड़ की माता को पुत्र वियोग का दर्द नहीं सहना पड़ा। जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि थी। इसलिए इस दिन से जीमूमतवान और जीवितपुत्रिका व्रत करने का विधान शुरू हो गया।

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